अच्छे ही रह गए

सोचते हैं जब हम यूं ही कभी मन लगाकर,
कि मुख्तसर-सी ज़ीस्त में कितने हसीन लम्हें हमने पाएं,
और उन्हें और अधिक जीने की चाहत में,
मासूम-सी सोच को भ्रष्ट करते चले आए,
अपनी ही मनोच्छाओं के बोझ तले हम दबे से रह गए,
दुनिया की नज़रों में अच्छे थे, बस अच्छे ही रह गए।

महसूस किया है अक्सर, टेढ़े लोगों का बोलबाला है,
सीधे-साधे बंदों के हाथ न आता कोई निवाला है,
कभी कहीं किसी पल सोच भी ले चलो उस और,
पर उन पलों के संदूक पर तो मानो बरसों से लगा कोई ताला है,
मुख्तलिफ चाबियों में से उस एक को हम ढुंढते ही रह गए,
और इसी ख़ोज में हम बिचारे, अच्छे थे अच्छे ही रह गए।

जो मिल रहा उससे ज्यादा पाने की आशा है,
काबू में रहती कहां, ये मासूम मन की अभिलाषा है,
यूं तो हम उन्हें कह भी दे कि क्या चलोगे हमारे संग,
पर मुफलिस के दिल को आती ही नहीं, ये उस लहजे की भाषा है,
मेरे अंतर्मन के सांचे में ख्वाहिशों के घड़े कच्चे रह गए,
वो हमें मानते रहे अच्छे, और हम बस अच्छे रह गए।

प्रयास यही रहता है अक्सर, चलूं लेकर के साथ सभी,
मिज़ाज किसी का विमुख न तुमसे, छाए मुस्कान हो बात जभी,
परंतु इस सफर में एक सिद्धांत सदैव आवश्यक है,
विचलित मन पर पार पाने में यह बहुत सहायक है,
कि उम्मीद रखने पर उनका टूटना तकलीफ़ देता है,
जो ना रखी हो तो वही एकतरफा सुकून दे देता है,
खाली उम्मीदें ही जाग रही, नज़्म-ए-किस्मत कहीं ठहर गए,
हम अज़ीज़ बनने आए थे, बस अच्छे बनकर के रह गए।

उड़ाने भरना चाहता है ये दिल, पर यही रूक जाता है,
अपनों से दूर होने को मोरा जी़ ज़रा नहीं चाहता है,
इसी कारणवश मान वो बैठे, लाभ हमारा उठा लिए,
अंदाज़ा न इस बात का उनको, आब हमारी बढ़ा दिए,
समय का पगफेरा है जनाब, फिर मिलेंगे सिर्फ कह गए,
लोगों की खिदमत करने आए थे, खुशी से करते रह गए,
जो कोई इस भाव को समझे, हम प्रवाह में उन्हीं के बह गए,
अब चाहे तुम जैसा भी मानो, हम तो अच्छे ही रह गए।

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